पुलिस उत्‍पीड़न, मानवाधिकार/Human Rights // पुलिस की मार के कारण शरीर में दर्द होता है

पुलिस की मार के कारण शरीर में दर्द होता है

डॉ. लेनिन रघुवंशी पूर्वी उत्तरप्रदेश में ग़रीब और कमज़ोर लोगों के साथ होने वाले  ज़ोर-जुल्‍म की कहानियां लगातार सरोकार को भेज रहे हैं. इस बार पेश है वाराणसी में पुलिस उत्‍पीड़न के  शिकार आशा मुसहर की दास्‍तां उन्‍हीं की जुबानी

पुलिसिया जुल्‍म के शिकार आशा मुसहर

मेरा नाम आशा मुसहर, वल्‍द स्वर्गीय हरि मुसहर, उम्र 40 साल, ग्राम-जमापुर, पोस्ट-पिण्डरा, थाना-फूलपुर, ब्लॉक-पिण्डरा, जिला-वाराणसी का निवासी हूँ। मेरी पत्नी का नाम उर्मिला है। हमारी दो बेटियां और तीन बेटे हैं।

मैं मेहनत करके अपने परिवार के साथ रूखा-सूखा खाकर जीवन बीता रहा था। तभी एक दिन अचानक गाँव के प्रधान पति अमरनाथ पटेल मेरे नाम से कोटा सत्तन पटेल को दिलवाने के लिए बुलाया। जब मैं सत्तन पटेल के साथ फूलपुर थाने में तस्‍दीक करवाने के लिए गया। तब वहां दरोगा बोले, ‘मुसहर हो कितनी बार जेल गये हो?’ मैं कुछ नहीं बोला। वहां से आने के बाद मड़ियाहू पत्ता लेने के लिए चला गया। मेरे न रहने पर मेरे घर एक जीप पुलिस आयी। मेरे बीवी बच्चों से मेरे बारे में धमकाते हुए पूछा। मैं पत्ता लेकर आया, अपनी पत्नी और बच्चों को रोता देखकर पूछा तो वो बोले कि पुलिस आयी थी। मैं प्रधान के पास गया। उन्हें सारी बात बतायी। उन्होंने मुझे अपने भतीजे के साथ थाने भेजा। जब मैं वहां गया तो पुलिस ने बिना कुछ कहे थाने बैठा लिया। अंधेरा होने लगा। मैं घर नही पहुँचा तो मेरी पत्नी और बच्चे घबराकर थाने आये। तो पुलिस ने एक चाकू (सबरी) दिखाकर उनसे बोले कि देखो ये चोरी करने जा रहा था। रात भर थाने पर बैठाये रखा। मुझ पर शांति भंग करने का मुकदमा चलाया। जिसकी जमानत पिण्डरा तहसील से हुई जिसमें रुपया 6000 रुपए लगे। मैं एक सप्ताह बाद तारीख पर गया। चोरी का एक वारंट मेरे नाम था। पैसा न होने के चलते जिसकी जमानत मेरे रिश्‍तेदार ने 6000 रुपए खर्च कर दिलवायी। बार-बार पुलिस के परेशान करने की वजह से काम भी सही तरह से नहीं कर पा रहा हूँ। दिमाग हमेशा परेशान रहता है। अभी डेढ़ महीने पहले दारू का केस लगाकर एक पुलिस मेरे नाम से घर पर वारंट लेकर आयी जिसकी जमानत अभी नहीं हुई है।

पुलिस के डर से मैं जौनपुर के चम्बल तारा में दूसरे की सगड़ी चलाता हूँ। दिन भर में कुछ आमदनी हो जाती है। घर का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता है। आज ही नहीं जब मैं चैदह साल का था, मेरी शादी के कुछ दिन ही बीते थे तब भरउरी में डकैती हुई थी। पुलिस शक के आधार पर मुसहर होने के नाते मेरी बस्ती में आयी। जाड़े की रात थी। मैं सोया हुआ था। अचानक दरवाजा पिटने की आवाज़ आयी। मैं हड़बड़ा कर उठा, दरवाजा खोला। देखा पुलिस। उस समय रात के बारह बज रहे थे। मुझे, मेरे पिता और चाचा को मारते हुए पुलिस फूलपुर थाने ले गयी। वो लोग हमें लगातार डंडे से मारते रहे। जगह-जगह से खून निकल रहा था। लेकिन कोई दवा नहीं दिये। चालान करके चौकाघाट जेल हमें भेज दिया गया।

ग्यारह महीने तक हम जेल में रहे। घर का खर्च चलाना मुश्किल था। घर के सभी लोग परेशान थे। उन्हें हमेशा यही डर बना रहता था कि कहीं पुलिस फिर बस्ती में आकर हमको परेशान न करे। जेल में हमसे काम करवाया जाता था। खाने के नाम पर दाल रोटी मिलती थी। जो मुँह से बाहर आ जाता था। मेरी दादी ने किसी तरह पैसों का इन्तजाम करके मुझे, मेरे पिता और चाचा की जमानत करवायी। अभी हम आये ही थे कि फिर एक हफ्ते बाद पुलिस ने मेरे चाचा से, जो कहीं से आ रहे थे, पूछा, ‘कहां हो, बस्ती में आने पर मिलोगे?’ चाचा ने कहा, हां साहब। फिर उसी रात एक जीप पुलिस आयी। हम लोगों को पकड़ कर ले गयी। रात भर थाने में रखा और दूसरे दिन चालान कर दिया।

लगभग तीन साल तक हम जेल में रहे। घर वालों ने जमानत करवाना चाहा, पर उनके बस में नहीं था। हम सारे मेहनत मजदूरी करने वाले तो जेल की मजदूरी कर रहे थे। वो तो किसी तरह अपने खाने के लिए एक वक्त की रोटी जुटा पा रही थी। जब कभी कुछ पैसों का इन्तजाम होता था। हमसे मिलने जेल में आ जाती थी। उस समय ऐसा लगता था कि मुसहर होने की यही सजा है। हम बिना कुछ किये बेगुनाह जेल में बन्द हैं। हमारी पत्नी, माँ और दादी हमारी राह तक रही है। जब ये बातें मैं सोचता था,  मन घबरा जाता था कि कैसे बाहर निकलूं। यही सब सोचते तीन साल तक जेल में रहे और केस खत्म हो गया। पुलिस के परेशान करने की वजह से मैं अपने घर नही आता हूँ। अगर आता हूँ तो अन्दर से हमेशा डर लगा रहता है कि कहीं फिर किसी झुठे केस में पुलिस पकड़ न ले जाए। मेरे लड़के मेरे साथ नहीं है। पुलिस के आये दिन परेशान करने की वजह से लड़कियों की शादी जल्दी कर दिये। काम में परेशानी होती है, पुलिस की मार कारण शरीर में दर्द होता है।

मुसहर बस्‍ती

अब मैं चाहता हूँ कि पुलिस मुझे परेशान न करें, मैं अपने परिवार के साथ रहूँ। छब्बीस साल से मैं उनके झुठे आरोपों का शिकार हो रहा हूँ। मेरी पत्नी, जिसे मेरी वजह से परिवार का कोई सुख नहीं मिल रहा है, मै चाहता हूँ कि उसे मेरा और बच्चों का साथ मिले। मुझे पुलिस के झूठे आरोपों में फँसाने की वजह से मुझे सजा हुई। उससे मेरी जिन्दगी नरक हो गयी। अब मेरे साथ दुबारा ऐसा न हो। पुलिस ने मेरे अन्दर डर पैदा कर दिया है। इसी डर से मैं घर से बाहर नहीं निकलता हूँ। लेकिन आप लोगों से सारी बात बता कर मेरे अन्दर का कुछ बोझ हल्का हुआ। मैं चाहता हूँ कि अब मुझे न्याय मिले। भगवान फिर मुझे उनके झुठे आरोप से बचायें।

फरहत शबा खानम और शिव प्रताप चौबे से बातचीत पर आधारित

डॉ0 लेनिन रघुवंशी 'मानवाधिकार जन निगरानी समिति' के महासचिव हैं और वंचितों के अधिकारों पर इनके कामों के लिये इन्‍हें 'वाइमर ह्युमन राइट्स अवॉर्ड', जर्मनी एवं 'ग्वांजू ह्युमन राइट्स अवॉर्ड', दक्षिण कोरिया से नवाज़ा गया है. इनसे pvchr.india@gmail.com पर संपर्क साधा जा सकता है.

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" पुलिस की मार के कारण शरीर में दर्द होता है " को 1 प्रतिक्रिया

  1. these things should must be stopped..

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