डॉ. लेनिन रघुवंशी पूर्वी उत्तरप्रदेश में ग़रीब और कमज़ोर लोगों के साथ होने वाले ज़ोर-जुल्म की कहानियां सरोकार को भेज रहे हैं. इस बार पेश है वाराणसी में पुलिस उत्पीड़न शिकार उर्मिला की दास्तां उन्हीं की जुबानी
मेरा नाम उर्मिला मुसहर, उम्र 35 वर्ष है। मेरे पति का नाम आशा मुसहर, उम्र-40 वर्ष है। मैं ग्राम -जमापुर, पोस्ट-पिण्डरा, थाना-फूलपुर, तहसील-पिण्डरा, जिला-वाराणसी की रहने वाली हूँ।
आज से करीब 20 साल पहले मेरी शादी हुई। शादी के छह महीने बाद से हम लोग मेहनत मजदूरी करके अपनी जिन्दगी गुजार रहे थे। तभी अचानक रात के बारह बजे एक जीप पुलिस मुसहर बस्ती में आयी। हम लोग रूखा-सूखा खाकर सो रहे थे। जाड़े की रात थी। मैं जिस कच्चे घर में दरवाजे की कड़ी लगाकर सोयी थी वह दरवाजा की तेज-तेज पीटने के कारण हिल रहा था। मैं और मेरे पति हड़बड़ा कर उठे। मैंने दरवाजा खोला। देखा ‘पुलिस’। हम लोग कुछ पूछते कि पुलिस वाले गन्दी-गन्दी गालियां देते और मारते हुए उन्हें फुलपुर थाने ले गये। रात गुजारना हमारे लिए मुश्किल हो गया था। रोते-रोते सुबह होने का इन्तजार करने लगे। उस समय यही सोच रहे थे कि ये मेरे साथ क्या हो गया। सुबह होते ही मैं अपनी सास के साथ पति से मिलने फूलपुर थाने गयी। वहां उनको देखकर रोने लगी। पुलिस वाले बोले, ‘रोओ लेकिन हम इसे नहीं छोड़ेंगे। उस समय ऐसा लगा कि कैसे मैं उनको पुलिस के पास से छुड़ा लाऊं। मैं रोते हुए वापस घर आ आ गयी।
मेरे पति को तीसरे दिन चालान करके चौकाघाट जेल भेज दिया गया। मेरे पति के जेल जाने के बाद ससुराल में मेरी सास मुझे खाने को नहीं देती थी। मुझसे जबरदस्ती जानवर चरवाती थी। यहां तक कि मुझे घर में सोने नहीं देती थी। मैं भूखी-प्यासी रहती थी। ठंड लगने की वजह से मैं सो नहीं पाती थी। पूरी रात रो-रो कर गुजारती थी। सोचती थी कि भगवान ये तूने कौन सा दिन दिखाया। अभी शादी का कोई सुख नहीं मिला और इतना बड़ा दुख हम पर आ गया। मैं अपने मायके चली गयी। वहा मेहनत मजूरी करके किसी तरह अपना पेट चला रही थी कि वहां भी मुझे आस-पड़ोस वाले चैन से रहने नहीं दे रहे थे। कह रहे थे दूसरी शादी कर लो अभी पूरी उम्र पड़ी है। उनकी बातों को मैं अनसूना कर देती थी। करीब ढ़ाई साल इसी तरह गुज़र गये। आज भी उन बातों को याद करती हूँ तो आँख से आँसू निकल जाते हैं। जब मेरे पति जेल से छूट कर घर आये तब मैं अपने ससुराल वापस आयी। फिर हम लोग मेहनत मजदुरी करने लगे। लेकिन आये दिन कहीं भी चोरी होती तो पुलिस मुसहर होने की वजह से बस्ती में आती थी और किसी न किसी को फर्जी आरोप लगाकर पकड़ ले जाती थी। घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया था। मैं ही कुछ मेहनत मजूरी करके अपने बच्चों का पेट पाल रही थी। कभी एक वक्त खाने को मिलता था कभी नहीं। बच्चों की पढ़ाई इसी वजह से छूट गयी।
पुलिस के बार-बार परेशान करने के डर से मेरे पति जौनपुर के चम्बल तारा में दूसरों की सगड़ी चलाते हैं। वो घर नहीं आते हैं। अगर कभी आते हैं तो उन्हें पुलिस का डर रहता है कि पुलिस फिर न पकड़ कर ले जाये। लड़कियों की शादी भी जल्दी कर दिये। लड़कों को भी रिश्तेदार के यहां रखा है। डर है कि पति न मिले तो पुलिस मेरे बच्चों को उठा ने ले जाये। आज पुलिस के कारण मेरा परिवार मेरे पास नहीं है। एक-एक पल गुजारना मेरे लिए भारी होता है। मेरा दिल रोता है। अकेला पाकर बस्ती के लोग मुझे परेशान करते है।
अभी पाँच महीने पहले मैं बस्ती के हैन्डपम्प से पानी लेने गयी। वहीं पर प्रेम मुसहर के लड़के राजू और गाँधी दोनों भाई मुझे घसीटते हुए लात मुक्के से मारने लगे। मैं रो रही थी पर मेरी मदद करने कोई नही आया। मैं रोते-रोते थाने गयी और बोली साहब वो लोग मुझे मार रहे हैं। उन्होंने मेरी कोई मदद नहीं की। मुझे समझा-बूझा कर भेज दिया। मैं रोते-रोते घर चली आयी। उस समय मुझे ऐसा लगा कि अगर मेरे पति और बच्चे होते तो क्या ये मेरे साथ ऐसा करते। आज मेरा परिवार मेरे साथ नहीं है। मैं अपने आप को अकेला महसूस कर रही हूँ। लेकिन बस यही उम्मीद भगवान से रहता है कि आज नहीं तो कल मेरा परिवार मेरे साथ होगा। मैं आपको सारी बात बताकर हल्का महसूस कर रही हूँ। मैं ये चाहती हूं कि जिन्होंने हमें यह दिन दिखाया है उसके खिलाफ सख्त से सख्त कारवाई हो और मुझे न्याय मिले।
फरहत शबा खानम और शिव प्रताप चौबे के साथा बातचीत पर आधारित







