शबनम ख़ान
शबनम खान की निगाहें अन्ना हजारे की अगुआई में हो रही हलचल पर थमी हुई हैं. उन्होंने टुकड़ों में अपनी राय सरोकार से साझा की है. कहा है, ‘माकूल लगे तो सरोकार पर चढ़ा दीजिए’. माकूल है या नहीं, यह फैसला सरोकारियों पर. दिलचस्प ज़रूर है. पेश किए देते हैं आपके लिए.
संपादक
एयरकंडिशन्ड सिनेमाघर की सीटों पर बैठकर ‘रंग दे बसंती’ फिल्म देख चुकी इस पीढ़ी ने शायद ही सोचा होगा कि किसी दिन उसे भी इस फिल्म की तर्ज पर देश प्रेम दिखाने का मौका मिलेगा. सड़कों पर किसी एक मुद्दे पर मिलकर सड़कों पर ज़ोरदार प्रदर्शन करने का मौका हाथ लगेगा. ये इस पीढ़ि का सौभाग्य है या फिर दुर्भाग्य कि इसे भी ठीक उसी तरह हाथों में बैनर और कैंडिल लिए इंडिया गेट पर जमा होना पड़ा जैसा फिल्म में दिखाया गया था.
सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे और उनकी टीम द्वारा चलाए जा रहे भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन को सबसे ज्यादा समर्थन देश के युवाओं का मिल रहा है. स्कूल, कॉलेज और ऑफिस छोड़ कर युवा देश के अलग-अलग हिस्सों में भ्रष्टाचार के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं. ख़ास बात है इनके प्रदर्शन का तरीका. नए नारों, रोचक तस्वीरों और संदेशों वाले बैनर, टी-शर्ट और टोपी पर आंदोलन के समर्थन में की गई कलाकारी और ढपली थपकाते गाते-बजाते पूरे जोश के साथ अपने विरोध का इज़हार … इन सबने भ्रष्टाचार के विरुद्ध किए जा रहे इस आंदोलन में जान डाल दी है.
ये वो युवा पीढी है जो फेसबुकिंग और मैसेजिंग के ताने सुनती है, ब्रैंडेड कपड़े खरीदने, पिज्जा खाने और पार्टी करने पर बड़ो की आंखों की किरकिरी बन जाती है. लेकिन इस पर उंगली उठाने वालों को ये बात समझ लेनी चाहिए कि युवाओं का ये अपना अंदाज़ है, उन्हें अपनी धुन में रहना पसंद ज़रूर है लेकिन उन्हें पता है कि इस देश का भविष्य उन्हीं के कंधो पर टिका हुआ है. युवा वर्ग अपनी इस जिम्मेदारी को बखूबी समझता है और निभा रहा है. दूसरी खासियत ये है कि माना जाता है कि युवाओं का रवैया बेहद ज़िद्दी और बिगड़ैल किस्म का होता है, वो अपनों से बड़ों की बातों को नज़रअंदाज़ करते हैं, लेकिन अन्ना के नेतृत्व में जारी इस आंदोलन में हर स्तर पर युवाओं की भागीदारी ने इस बात को भी गलत साबित कर दिया है. युवाओं ने इस आंदोलन को जितनी गंभीरतापूर्वक लिया है और इस मामले में जितना धैर्य बरता वो काबिल-ए-तारीफ है.
उसका अंदाज़ कुछ अलग ज़रूर है. जैसे वो अपने दोस्तों और अपने सर्कल के लोगों को इस आंदोलन से ज़ुड़ने की अपील फेसबुक और एसएमएस से करता है, विरोध प्रदर्शन में जहां जम कर नारे लगाता है वहीं अपने स्मार्टफोन और सोशल नेटवर्किंग की मदद से प्रदर्शन की तस्वीरें लाइव अपलोड करता है, अपनी टी-शर्ट पर मार्कर से तिरंगा बनाता है और संदेश लिखता है, जब थोड़ा थक जाता है तो पेप्सी और कोक पीकर अपनी प्यास बुझाता है.
अंदाज़ बेशक अलग है लेकिन जज़्बा और नज़रिया वही जो किसी भी देशभक्त का होता है. नतीजा भले ही कुछ निकले लेकिन युवाओं की इतने बड़े स्तर पर भागीदारी एक बहुत बड़ी उपलब्धि है.
ज़रा आकाश में उछाले जा रहे नारों पर ग़ौर फरमाते हैं …
सरकार पर निशाना साधने में मददगार लफ्ज:
अब तो ये स्पष्ट है, केंद्र सरकार भ्रष्ट है
मनमोहन सिंह जिसका ताऊ है, वो सरकार बिकऊ है
सोनिया जिसकी मम्मी है, वो सरकार निकम्मी है
सारी दुनिया यहां है, राहुल गांधी कहां है
हू हा हू हा, कपिल सिब्बल चूहा
पुलिस वालों को देखकर कुछ यूं आवाज़ उछाले जा रहे हैं :
ये अंदर की बात है, पुलिस हमारे साथ है
अन्ना हज़ारे के प्रति श्रद्धा कुछ उमड़ रहा है :
ये अन्ना नहीं आंधी है, देश का दूसरा गांधी है
हमारा नेता कैसा हो, अन्ना हज़ारे जैसा हो
अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं
और अंत में कुछ औपचारिकता इस तरह निबटाए जाते हैं:
वंदे मातरम
भारत माता की जय
असल में, अन्ना द्वारा भ्रष्टाचार के विरुद्ध छेड़ी गयी ये मुहिम अब सिर्फ भ्रष्टाचार के खिलाफ ही नहीं रही. उसमें शामिल होकर देखिए, आप महसूस करेंगे कि ये भारतीयों के अंदर सालों से कैद विभिन्न सरकारों और सिस्टम के खिलाफ गुस्सा, भड़ास और दुख का एक गुबार है. ये अब आंधी के रूप में बाहर निकल रहा है.
आंदोलनकर्ताओं को खुद नहीं पता कि ये आंदोलन कहां तक जाएगा और कितना बदलाव लाएगा. लेकिन उन्हें इस बात का संतोष है कि सारा देश इसमें अपना समर्थन देने के लिए आगे आया है. दीपक चौरसिया भले ही विरोध प्रदर्शनों के बीच में घुसकर लोगों को पकड़ कर उनसे पूछ रहे हों कि लोकपाल बिल है क्या, और उनके न बता पाने पर स्टार न्यूज के दर्शकों को ये बता रहे हों कि विरोध कर रहे लोगों को ये तक नहीं पता कि लोकपाल क्या है, लेकिन सच ये है कि अब बात सिर्फ लोकपाल बिल की रह नहीं गई है, अब बात आ गई है देश की जनता कि सहनशक्ति की.
अन्ना ने लोगों को उम्मीद दी है, बदलाव अब भी मुमकिन है. बेहतर संभव है. वरना अपनी ज़िंदगी को किसी तरह पटरी पर बनाए रखने की जद्दोजहद में लगे देश के लोगों को ये होश कहां था कि उनके साथ अन्याय हो रहा है, उनके अधिकार छिन रहे हैं. जिन्हें अपने साथ हो रहे सरकारी अन्याय का इल्म था भी, वह अकसर कहते दिख जाते थे कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता. इस छोटे से वाक्य में लोगों की निराशा साफ तौर पर झलकती थी. अन्ना की इस मुहिम
के बाद कुछ बदला हो या नहीं, लोगों का नज़रिया ज़रुर बदला है. बसों, मेट्रो, सड़को, घरों और ऑफिसों में लोगों को ये कहते देखा जा सकता है कि इस बार ज़रूर कुछ होगा, बदलाव आकर रहेगा.
लोकपाल बिल बने या न बने, भ्रष्टाचार मिटे या न मिटे, लेकिन देश की जनता के लिए अन्ना हज़ारे उम्मीद की एक किरण बनकर आए हैं. अन्ना और उनकी टीम ने लोगों के मन में जो जज़्बा और देश के लिए प्रेम की भावना जगाई है वो किसी भी लोकपाल बिल से बढ कर है.
अन्ना एक शख्सियत नहीं बल्कि एक प्रतीक बन चुके हैं अन्याय के खिलाफ क्रांति का प्रतीक. शायद इसीलिए हर प्रदर्शन में ये नारा गूंजता हुआ सुनाई दे रहा है, ‘मैं भी अन्ना तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना’.











bahut khub
शबनम, आपका लेख मुझे बेहद पसंद आया, युवा वर्ग को आज तक जिस प्रकार बूढ़े ज़बानों ने पेश किया था इस आन्दोलन ने उसे न सिर्फ गलत साबित किया बल्कि आन्दोलन की एक नयी परिभाषा भी गढ़ी, हालांकि यह लेख कुछ पुराना है, मगर यह अभी मेरी निगाह से गुज़रा तो पढ़े बिना रहा न गया .. आपके कलम को सलाम
[...] कल सरोकार पर प्रकाशित शबनम खान के लेख फेसबुक, पिज्जा और अन्ना पर प्रतिक्रिया स्वरूप सरोकार को [...]
सब बातों से सहमत होना ज़रूरी नहीं मगर अन्ना के पीछे उमड़ी भीड़ के कारणों की पड़ताल बड़ी बारीक है! बेहतरीन आकलन