भारत में दर्जनों भाषाएं हैं. सैकड़ों बोलिया हैं. हजारों पहचान है. सबमें अनूठी मिट्टी की खुशबू है. रिवाज है. सुख है. दुख है. मौज है. मस्ती है. बहार है, जज्बात है. गम है. हवाओं में व्याप्त धूल के कण की माफिक अनगिनत अहसास है. लिखी जा रही हैं इबारतें सभी भाषाओं में. कुछ पुरानी. कुछ एकदम टटका. किसी लेखी ने किसी को कबीर बना दिया, किसी को तुकाराम. कोई नागा अर्जुन हो गया. कोई हो गया नाम देव. जो सोचा सो लिखा, जो देखा सो रचा, जो भोगा सो दर्ज किया. रचनाकर्म की सनातनी निरंतरा चिरकाल से जारी है. चिरयौवना की तरह.
इतना विशाल भारत-वर्ष. कहां चिन्हा-परची कर पाते हैं हम सबसे. न लोग से. न खान से. न पान से. न रिवाज से. बोली और भाषा से भी नहीं कर पाते हैं. सुनते हैं बिना अंग्रेजी के उत्तर वाला दक्खिन वाले से नहीं बतियाता. काहे कि उसे दक्खिनी नहीं आती. न कन्नड़, न तेलुगू. न मलायम ही. कितना बड़ा धोखा देते हैं उत्तर वाले खुद को ऐसा कह कर. दिल्ली में रहने वाला उत्तरी, कश्मीरी से ही कब बतिया लेता है. उल्टे कश्मीरियों को बतियाते देख, उसके बारे में राय बनाने के फेर में पड़ जाता है. ‘हिन्दी पट्टी’ का प्रतिनिधि मानने वाला इंसान, स्वयं को इस भारतवर्ष का सबसे उत्तम नस्ल का मानता है. क्योंकि वह दिल्ली है. या दिल्ली के करीब है. यह भाव रिवाज से रचनाकर्म तक, चहुंओर हावी है. तोड़ने की जरूरत है. इस बोध को.
दिल्ली में इंडिया हैबिटेट सेंटर है. देश के कोटि के अभिजात सांस्कृतिक केंद्रों में से एक. भारतीय संस्कृति के विविध पक्षों पर चर्चा से लेकर प्रस्तुतियों के लिए मशहूर. होता रहता है हमेशा कुछ न कुछ. कभी बहुत खीस पैदा होती है कि गांव-जवार के जज्बातों से पैदा होने वाली कलाओं का इस हैबिटेट सेंटर में प्रदर्शन का क्या मतलब! ठहर कर सोचने पर लगता है कि अगर इस सेंटर पर ये प्रदर्शन न हों, न हों ये प्रस्तुतियां, तो और हो भी कहां रहा है! भला ही तो कर रहे हैं आई एच सी वाले. न करते तो कौन जानता कि छत्तीसगढ में कोई नाच होता है! दो-तीन हफ्ते पहले मालूम हुआ, आई एच सी ‘भारतीय भाषाओं का महोत्सव’ का आयोजन कर रहा है. खूबसूरत सा नाम दिया है ‘समन्वय’. कहां गले में साहित्य और कला का ढोल टांग कर दहाड़ मारने वाली संस्थाओं को समन्वय करना चाहिए, कहां ये आईएचसी भीतरे-भीतर इसकी तैयार करने लगी. पक जाने के बाद ही बताया कि खिचड़ी तैयार कर ली है. आओ चख लो!
आईएचसी के निदेशन श्री राज लिब्राहन साहब कहते हैं, ‘बहुत दिनों से मन में खलबली थी इस बात को लेकर. अंग्रेजी में ऐसे आयोजनों की परंपरा है. लिखने वालों को पढने वाले जानते हैं और पढने वालों को लिखने वाले. बाकी अन्य भारतीय भाषाओं में वैसी स्थिति नहीं है. हिन्दी को करीब से जानता हूं, यहां बड़ा गैप दिखता है. मेरे खयाल से अन्य भारतीय भाषाओं की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है. इसलिए सोचा कि क्यों न कोई ऐसा मंच बने जिसमें फिक्शन लिखने वाले, नॉन फिक्शन लिखने वाले लोग एक साथ आएं, लोगों के सामने आएं, पाठकों के सामने आएं. आपस में परिचय करें. जब वे आपस में ही नहीं जानेंगे एक-दूसरे को, तो रचना किस प्रकार करेंगे. रचना तो जीवन के मर्म से ही तो पैदा होती है.’
इतना आसान भी नहीं था ‘समन्वय’ के लिए समन्वय बनाना. 28 राज्यों और 6 केन्द्र शासित प्रदेश से कुल 14 भाषाएं के 63 लेखक/वक्ताओं का जुटान ‘आग का दरिया और डूब के जाने से कम’ नहीं था. तीन महीने पहले विचार गर्भ से बाहर आया. लिब्राहन साहब ने सत्यानन्द निरुपम और गिरिराज किडाडु से साझा किया. नेकी और पूछ! अलग-अलग प्रादेशिक संस्कृतियों से निकले एक ही भाषा को जीने वाले दो साहित्य प्रेमी सत्यानन्द और गिरिराज जुड़े राज लिब्राहन साहब के साथ. साथ ही जुड़ी भारतीय परिवारों में पढने की आदत बचाए और बनाए रखने में सालों से योगदान दे रही संस्था ‘दिल्ली प्रेस’ और लिपियों के साथ रचनात्मक खेल के लिए समर्पित ‘प्रतिलिपि’. तीन संस्थाएं और उनसे जुड़े दर्जनों लोग. सबकी साझी मेहनत. आज ‘समन्वय’ साकार हो रहा है.
दिल्ली में लग रहा है ये जमघट. दिल्ली में हो रहा है ये आदान-प्रदान. जाहिर है दिल्ली हावी रहेगा ही. दिल्ली में पसरे पुरस्कार प्राप्त, उम्रदराज साहित्यकारों और घाघ लिखाड़ों से उन युवाओं को बहुत उम्मीद रहेगी जिन्होंने अभी-अभी रचनाकर्म में गोता लगाना शुरू किया है. अर्थात् जो रंगरुटिए हैं.
मुश्किल था इतनी विविध पृष्ठभूमि के रचनाकारों से संपर्क करना, उन्हें एकजुट करना. सच है कि आभासी संसार भौतिक संसार के काफी सारे कामों को सरल बना दिया है लेकिन झारखंड और छत्तीसगढ के जंगल में बैठ कर अपना दर्द जोत रहे लेखक तक पहुंच पाना इतना आसान भी नहीं था. न ही कर्नाटक के गांव में बैठ कर आपबीती कलमबद्ध करती किसी औरत के पास पहुंचना. सत्यानन्द के मुताबिक, ‘पुरानी जान-पहचान काम आयी. वो दोस्ती काम आयी जो पहले गांठी गई थी. आइडिया सुनने के बाद उन्होंने रचनाकारों के नाम रेकमेंड करने शुरू कर दिए. हम भी समेटते गए. बाद में फिर अपने स्तर से विभिन्न माध्यमों से हमने उनकी पड़ताल की. उनके रचना-संसार से दो-चार हुए. फिर उन्हें आमंत्रित किया गया. पैनल वगैरह तो आगे आकर डेवलप किया गया.’
सत्यानन्द ने जो बताया उससे यह लगा कि समन्वय’ की खासियत इसकी जवानी है. जवानी माने 63 में 20 सहभागी रचनाकार युवा हैं. इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि पुरस्कुराए घाघ साहित्यकार इन्हें यूं ही ‘आंचोर-पाका’ और ‘लौंडे-सौंडे’ कहकर महफिल लूटने की कोशिश न करेंगे. समन्वय से बहुत उम्मीदें हैं.
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