तारुफ़

… ये नहीं आकाशवाणी दोस्‍तों

ये तो है आवाज़ रोती धरती की

मशहूर पंजाबी कवि सुरजीत पातर ने ये पंक्तियां शायद उस संदर्भ में लिखी थीं जब आकाशवाणी या व्‍यापक रूप से मीडिया केवल आतंकवाद के शिकार हुए और मारे गए लोगों की ख़बर देता था. लेकिन, काश! ये मीडिया रोती धरती की आवाज़ बन सकता. कभी मीडिया राज का माउथपीस था तो आज बाज़ार का है. जब राज ही बाज़ार की ग़ुलामी करने लगा तो मीडिया क्‍या करता ! जो कर सकता वो कर रहा है. ख़बर एक ‘प्रॉडक्‍ट’ है; चैनल, अख़बार, रेडियो – सब दुकान और जनता बेचारी ख़रीदार. प्रॉडक्‍ट कितना भी चटखदार क्‍यों न हो, अकेले नहीं बेचना. ख़बर उस बड़े पैकेज का एक छोटा हिस्‍सा है जिसमें कम्‍प्‍युटर-कार, बीमा-लोन, तेल-साबुन, दवा-दारू, दाना-पानी, वग़ैरह-वगैरह और भी बहुत कुछ बेचा जाना है. इसलिए आधे घंटे के न्‍यूज़ बुलेटिन में सोलह मिनट के विज्ञापन को देख कर हैरान क्‍यों होते हैं.

राष्‍ट्रपति-प्रधानमंत्री की यात्राएं, पक्ष-विपक्ष की बयानबाज़ी, शिष्‍टमंडलों का आना-जाना, सेंसेक्‍स की उठापटक, डॉलर का उतार-चढाव, खेलों में जीत-हार – ये सब पुरानी बातें हैं या फिर इनके लिए सरकारी मीडिया है ही. सरकार से परे, चैनलों और अख़बारों में ख़बर वही जो सनसनी फैलाए. अपराध, हादसा, स्‍कैंडल, गौसिप, फेयर, शॉपिंग, क्रिकेट, फ़ैशन: सबकी जगह है लेकिन तभी तक जब तक ये बिकाउ हैं और नया माल नहीं आता. ब्‍लू लाइन से कुचले जाना, चार घंटे बिज़ली गुल हो जाना, नेताजी के वायदे के बावजूद अस्‍पताल और स्‍कूल का चालू न होना, किसी ग्रामीण, दलित, आदिवासी का अच्‍छे अंक लाना – ये भी ख़बर बनती है, मगर चलती नहीं. बेअसर है : क्‍योंकि न तो टिकाउ हैं और न ही बिकाउ हैं. हम सब मीडिया में अपना अक्‍स ढूंढते हैं. छटपटा कर रह जाते हैं, कशमशा कर रह जाते हैं.

ये हाल महज़ बड़े शहरों का नहीं है. गांव-देहात की दुनिया, मोहल्‍लों-बस्तियों की दुनिया, ग़रीब-गुर्बे की दुनिया, मेहनतकशों-आदिवासियों-‍दलितों-विक्‍लांगों-औरतों-बच्‍चों की दुनिया, बेघरों की दुनिया, किताबों की दुनिया, कलाओं की दुनिया, आबो हवा और सेहत की दुनिया: सब कुछ टीआरपी के बाज़ार में अकसर दरकिनार हो जाती है. चार-पांच बरस पहले कुछ सिरफिरों ने ऐसी ही दुनिया की रोज़मर्रा की नब्‍ज़ पकड़ने का सफ़र शुरू किया था. उस सफ़र ने मीडिया के संदर्भ में अब अपने सरोकार पहचाने हैं. ये सरोकार हम-आप-सब के हैं. इसलिए यह आवाज़ भी हम सबकी होगी. छोटी और हाशिए की ख़बरें जो हमारी हैं, हम पे बड़ा असर डालती हैं, अब केंद्र में आनी चाहिएं. या यूं कहें कि केंद्र  और परिधि होते ही नहीं है.

किसी भी पेशे में रहते हुए, पढते हुए या घरेलू जिम्‍मेदारियां निभाते हुए, व्‍यक्तिगत तौर पर या संस्‍था के रूप में – अगर आपको कुछ भी भला या बुरा लगता है और आपके अनुसार जिस पे ज़माने की नज़र नहीं गयी है या जिसे बड़ी बहस का हिस्‍सा बनना चाहिए तो उसे रिपोर्ट, आलेख, संस्‍मरण, इंटरव्‍यू, ऑडियो, विडियो, तस्‍वीर, रेखाचित्र, इत्‍यादि किसी भी स्‍वरूप में हमारे पास भेजें. संपादन आपकी मौलिकता पर हावी नहीं होगा और आपको यथोचित क्रेडिट दिया जाएगा. पारिश्रमिक की गारंटी फ़ि‍लहाल नहीं.

" तारुफ़ " को 9 प्रतिक्रियाएँ

  1. ikram says:

    it is an very good web side.great articals and nice afforts…….thanx.keep it up

  2. urmila harit says:

    srokar nam bhut achcha lga.srokar ke sath-sath eske jeer-e-bahas or threek bhi apne nam ko sarthak kr rhe hai. Jati ko katti aoraten or polisia yatna ki shikar ki khudbyani jesi aamjan se judi reports kafhi umda hai, Mere shahar ki pagal aorat bhut samvedansheel hai.umeed hai ki sarokar aage bhi aamjan ke sarokar se yunhi juda rhega

  3. सुशील कुमार छौक्कर says:

    क्या कहूँ …सबसे पहले तो यही मुझे इसका नाम बहुत ही पसंद आया। आजकल जमीन से जुड़े सरोकारों की कौन बात करता है। जिसे देखा उसे या तो अपनी चिंता है या फिर बाजार की,बैशक कोई सरकार हो या फिर पार्टी विशेष या मीडिया से जुड़े लोग….। उम्मीद है यहाँ उन सरोकारों की बात होगी जिनको या तो कम लोग करते है या फिर करने से कतराते है। ढेर सारी शुभकामनाएं सरोकर के लिए।

  4. सरोकार के आकार ने बेहद लुभाया। बहुत नेक हैं जहां, समझ में आया।

  5. Shantanu says:

    Looks really neat. Lets make it better and more active :)

  6. swatantra says:

    aapko bahut bahut badhai…

  7. mamta nigam says:

    its great to have such initiative for alternative media…I hope we will be able to know new ideas and the things happening in the society in a right manner through Sarokar. All the very best for its success…

  8. वेब के माध्यम से ‘सरोकार’ का विश्व से सरोकार हो रहा है, देखकर खुशी हो रही है। सरोकार की सफलता के लिए शुभकामनायें।

  9. सरोकार पर पहली बार आना हुआ। मुझे ऑनलाइन वर्ल्ड सबसे अधिक भाता है। मेरा मानना है कि इस मंच का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है। आशा है सरोकार अपने मूल्यों पर टिका रहेगा।

अपनी टिप्पणी छोड़ें

XHTML: आप अपने कमेंट में निम्न HTML टैग भी इस्तेमाल कर सकते हैं: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>

कॉपीराइट © 2011 सरोकार. सर्वाधिकार सुरक्षित।

तकनीकी सहयोग शैलेश भारतवासी, नन्‍दीप माली.