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" संपर्क " को 8 प्रतिक्रियाएँ

  1. संपूर्ण क्रांति का अधूरा सपना -विमल कुमार सिंह 30 साल पहले देश में यह कह कर आपातकाल लगाया गया था कि देश की आंतरिक स्थिति ठीक नहीं है। उस तथाकथित खराब स्थिति को सही करने के लिए इंदिरा गांधी सरकार की ओर से जो कदम उठाए गए, वे किसी भी सभ्य लोकतांत्रिक समाज के लिए बेहद खतरनाक हैं। दो साल के थोपे हुए आपालकाल के दौरान सुरक्षा एवं अनुशासन के नाम पर प्रेस का गला घोंट दिया गया, विरोधी नेताओं व कार्यकर्ताओं को जेलों में ठूंस दिया गया, लोगों की जबर्दस्ती नसबंदी की गई और वे अन्य सभी चीजें की गईं, जो इंदिरा गांधी की तानाशाही को पुष्ट करती थीं। लेकिन सरकार की सभी कोशिशों के बावजूद देश के आम नागरिक को आतंकित नहीं किया जा सका। जेपी आंदोलन के रूप में देश की आम जनता ने सरकार के तानाशाही रवैये का जमकर विरोध किया और अंतत: 1977 में तानाशाही की प्रतिमूर्ति बनी इंदिरा गांधी से मौका मिलते ही सत्ता भी छीन ली। तानाशाही का रूप ले चुकी इंदिरा सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए जिस जनता ने संघर्ष किया था, उसे आशा थी कि दिल्ली में आने वाली नई सरकार, जिसे उसने चुना था, केवल सत्ता परिवर्तन की ही नहीं बल्कि संपूर्ण क्रांति की अग्रदूत बनेगी। लेकिन जनता का यह सपना, सपना ही रह गया। इसका आभास स्वयं लोकनायक जयप्रकाश नारायण को भी हो गया था। नई सरकार बनने के साथ ही देश के राजनीतिक चरित्र में उत्थान होने की बजाय पतन की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई। जेपी आंदोलन के कई नायक उसी दुष्चक्र में फंसते चले गए, जिनके लिए वे कभी इंदिरा सरकार को कोसा करते थे। आज उनके लिए भी राजनीति, व्यवस्था परिवर्तन या संपूर्ण क्रांति को साकार करने का माध्यम न होकर, सत्तासुख भोगने का उपकरण बन चुकी है। 1975 में देश के राजनैतिक क्षितिज पर जो विभाजक रेखा खिंची थी, वह कब की मिट चुकी है। उस समय के कई विरोधी आज एक-दूसरे के समर्थक बन चुके हैं और जो आज भी विरोधी बने हुए हैं, उनमें इतना नैतिक बल नहीं रहा कि वे सत्तापक्ष की जनविरोधी नीतियों के विरोध में जनता को अपने साथ लेकर जेपी जैसा एक व्यापक जन आंदोलन कर सकें। 1975 में देश के समक्ष जो परिस्थिति थी, आज के हालात उससे भी कहीं विकट हैं। आज सोच एवं तौर तरीकों के मामले में विपक्ष और सत्तापक्ष में कोई अंतर नहीं रह गया है। सभी दलों के लिए प्रगति का पैमाना बाजारोन्मुख है। देश के आम आदमी के लिए क्या जरूरी है, इसकी न तो किसी राजनीतिक दल को चिंता है और न ही चिंता करने की शक्ति। इसलिए आम आदमी को सूझ नहीं रहा कि वह क्या करे। वह जिसे अपना नायक बनाता है, वह उसकी चिंता करने की बजाय, बाजार की चिंता करने लगता है। लेकिन इस निराशाजनक स्थिति के बावजूद जनता को अपने सच्चे नायक की तलाश करनी ही होगी और साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उसका नायक सत्ता परिवर्तन का नहीं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन एवं संपूर्ण क्रांति का सूत्रधार बने।

  2. Ashok Kumar says:

    प्रिय संपादक महोदय,
    सुश्री वाजदा तबस्सुम ने आपकी वेबसाइट पर हमारे विरुद्ध एक पत्र लिखा है. उनके समर्थन में मेरी बहन अनीता भारती ने भी एक चिट्ठी लिखी है. हम केवल इतना कहना चाहते हैं कि उनके द्वारा लगाये गए सभी आरोप बेबुनियाद व निराधार हैं. सुश्री तबस्सुम का यह दावा कि वह कदम या नेक्डोर की संस्थापक सदस्य हैं भी पूरी तरह बेबुनियाद और सफ़ेद झूठ है.
    कोई भी संगठन बिना अनुशासन के नहीं चल सकता. संगठन के पदाधिकारियों की जिम्मेवारी होती है कि संगठन के असूलों की पूर्ति के लिए जो संभव कदम हैं, वह उठायें और जो उस जिम्मेदारी को सबसे ज्यादा सक्षम तरीके से कर सकें और जहाँ रह कर कर सकें, वहां पर उससे काम लिया जाये. सुश्री तबस्सुम ने न सिर्फ संगठन के द्वारा सौंपी गयी जिम्मेदारियों को पूरा नहीं किया, बल्कि अपने निजी हितों की खातिर संगठन और संगठन के पदाधिकारियों को बदनाम करने में किसी किस्म की कोई कसर नहीं छोड़ी. कोई भी संगठन ऐसे हालात में किसी ऐसे व्यक्ति को साथ लेकर नहीं चल सकता.
    सुश्री तबस्सुम ने जिस थाली में खाया, उसी में छेद किया. रजनी तिलक के यहाँ चार-पांच साल रहने के बाद उन्होंने रजनी और उसके बेटी के बीच में मतभेद पैदा करने में उसने कोई कसर नहीं छोड़ी. अब अनिता की चिट्ठी से जाहिर है कि उसने भाई बहन के बीच में मतभेद पैदा करने में अपना पूरा योगदान अदा किया है.
    हम अपने आप को ऐसे व्यक्तिओं के साथ बिना वज़ह की बहस में फंस कर अपना व अपने दलित आन्दोलन का समय खराब नहीं करना चाहते. हमने समाज के लिया जो किया, वह सबके सामने स्पष्ट है और हमें यकीं है कि आगे भी हमारा काम ऐसी बेबुनियाद बातों का जबाब खुद दे देगा. जो यह सोचते हैं कि सुश्री वाजदा तबस्सुम ने इस तरह की चिट्ठियां लिख कर बहुत अच्छा काम किया है व आन्दोलन और संगठन के नाम को रोशन किया है, वह सुश्री तबस्सुम को अपने यहाँ नौकरी व काम अवश्य दें. हमारी शुभकामनायें उनके साथ हैं.
    अशोक कुमार

  3. Kamal Chand says:

    For the first time I came across Sarokar. I am impressed and deeply desire to raise the voices of Domestic Workers through you. I am working as a Project manager in Domestic Workers’ Forum, New Delhi. I feel Sarokar would help the wider cause of Domestic workers in getting their rights.

  4. adab,
    pahli bar aapse mukhatib hua.
    baht achcha laga aapka udghish….
    chooti huyi aawazon ka pairokar.
    sarokar ko mera namskar aur pya.
    josh aur jazbe se kiya gaya aapka kam samaj aur kulk ke liye upyogi.
    main bhi kuch aap se baatna chahunga.. jald.
    duaon ka talib…
    afsar sagar

  5. mazher_nadeem says:

    aap achha kam kar rahe hai , humari bhi kosisha rahegi kucha dusare lekhak ka aap ke vicharo se mel khanta hua lekh bhijun

    nadeem

  6. सरोकार पर पहली बार आना हुआ। मुझे ऑनलाइन वर्ल्ड सबसे अधिक भाता है। मेरा मानना है कि इस मंच का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है। आशा है सरोकार अपने मूल्यों पर टिका रहेगा।

  7. munna k says:

    badhiya prayas ..pahli baar sarokaar par aya.par ab main kah sakta hoon ki sarokar ke prayason se judkar mujhe achcha lagega

  8. Nice to see your “Sarokar”. I also publish cartoons under “Sarokaar – The Concern” blog page.
    You may see the posts..If feel so, feel free to sublish from Sarokar ro Sarokar..
    Looking forward for your feed..

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