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जीवंत हुआ ‘मोहनदास’

जीवंत हुआ 'मोहनदास'
अमितेश कुमार यथार्थ को आप कैसे पकडेंगे. आप् कह सकते हैं कि यथार्थ को पकड़ना क्या है  जो हमारे सामने है यथार्थ है. लेकिन क्या यथार्थ इतना ही है. दर्शनशास्त्र... 

युग के अंधापन की कथा नहीं कह पाया यह ‘अंधा युग’

युग के अंधापन की कथा नहीं कह पाया यह 'अंधा युग'
अमितेश कुमार अंधा युग अपनी सरंचना में ही भव्यता को समेटे हुए है. इसको पहचानते हुए इब्राहिम अल्काज़ी ने इसको तालकटोरा, पुराना किला और फ़िरोज़ शाह कोटला में किया... 

इतिहास बने के कगार पर पहुंच गइल लौंडा नाच

इतिहास बने के कगार पर पहुंच गइल लौंडा नाच
    अमितेश कुमार उम्र के मार से जर्जर भईल ओह शरीर में आजो उहे लोच बा. आंख में चमक बढ़ जाला जस ही केहु नाच के नाम ले लेवेला. उ शान से रऊआ के बतीयहें कि मुजफ़्फ़रपुर... 

भारंगम में रंगतलाशी

भारंगम में रंगतलाशी
    अमितेश कुमार   अमितेश का रंगमंच और फिल्‍मों से पुराना नाता है. बचपन का. देखते-देखते कला को परखने की आदत पड़ गई. बेशक कला की इनकी परख धुरंधर आलोचकों और... 

वक्त के औराक़ बनते हंसी के अलंबरदार

वक्त के औराक़ बनते हंसी के अलंबरदार
    एम. अफसर खां सागर   किसी विचारक ने कहा है कि ‘व्यक्ति को अगर जीवन में सफल होना है तो आम जिन्दगी में एक कलाकार की तरह अभिनय करे औैर जब रंगमंच के स्टेज पर... 

ग्‍लोबल लोक कलाकार भिखारी ठाकुर

ग्‍लोबल लोक कलाकार भिखारी ठाकुर
    मुन्ना कुमार पाण्डेय   अबहीं नाम भईल बा थोरा | जब यह छूट जाई तन मोरा || तेकरा बाद पच्चास बरीसा  | तेकरा बाद बीस दस तीसा || तेकरा बाद नाम हो जईहन | पंडित-कवि-सज्जन... 

भारतेन्‍दु नाट्य अकादमी में छात्र-हड़ताल

भारतेन्‍दु नाट्य अकादमी में छात्र-हड़ताल
    राघवेन्‍द्र प्रताप सिंह   संस्कृति ने सभ्यता से एक सवाल किया, ‘क्या मेरे बिना तुम्हारा स्वरूप निखर सकता है?’ सभ्यता ने कहा हाँ! पर थोड़े ही दिनों बाद... 

मचान:प्रयोग और सहभागिता से उभरा थियेटर

मचान:प्रयोग और सहभागिता से उभरा थियेटर
  मुन्‍ना पांडे   एक समय रंगजगत पर बादल सरकार ने तीसरे रंगमंच से रंगजगत का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया था. पर हमारे इस चौथे किस्म के रंगमंच का आधार कोई थ्योरी... 

याद-ए-जुलिआनो …

याद-ए-जुलिआनो ...
प्रकाश के रे   तीस अप्रैल की शाम राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दिल्ली के सम्मुख सभागार में जाने-माने फ़लस्तीनी-इज़रायली फ़िल्मकार और नाटककार जुलिआनो मेर ख़मीस... 

कुछ गुमान था जो रह गया

कुछ गुमान था जो रह गया
मृत्युंजय प्रभाकर भारत रंग महोत्सव का तेरहवां संस्करण रंग प्रेमियों के लिए नया अनुभव देने वाला साबित हो सकता है था लेकिन वह बहुत हद तक अपने प्रयास में असफल... 

अपने-अपने बिम्‍ब

अपने-अपने बिम्‍ब
अंजुले श्याम मौर्य 13 जनवरी, थियेटर उत्सव के बिम्ब एन एस डी, श्री राम सेंटर, मंडी हाउस की गलियों में 7 जनवरी से ही अपनी छठा बिखेर रहे हैं. रंगमंच की रंगीनियां पूरे... 

चैनलों की फुसफास

बंबई में लियोपोल्‍ड कैफे में शिवसेना की हुड़दंग पर विनीत ने आज एक पोस्‍ट लिखा है. कुछ तकनीकी दिक्‍कत की वजह से मेरी राय वहां पोस्‍ट नहीं हो पा रही है, लिहाज़ा... 
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